DUAC - Delhi Urban Art Commission
''वास्तुकीय विरासत : विकास के साथ संरक्षण`` पर दिल्ली नगर कला आयोग की अगस्त 2007 में हुई कार्यशाला की कार्यवाही
इस कार्यशाला में वास्तुकीय विरासत के अभिरक्षकों के सामने आने वाली समस्याओं, उनके निवारण, इस विरासत को शहर में विद्यमान व बनने वाले सड़कों और पुलों को शोकेसों के जरिये दरसाने के संभावित तात्कालिक उपायों पर चर्चा हुई ।
भारतीय पुरातत्व विभाग के दिल्ली सर्किल के अधीक्षक वास्तुविद श्री ए.के. सिन्हा ने पूरे जोर-शोर से विशेषतया शहरी-कृत गावों में विरासत स्थलों के अतिक्रमण की बात उठाई और कहा कि इन विरासतों की अनेक सम्पदाओं को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है तथा इस बारे में सतत सतर्कता आवश्यक है । उन्होंने सन् 1907 से पूर्व (अधिनियम में विनिर्दिष्ट 100 वर्ष की अवधि को ध्यान में रख कर) बनी इमारतों को सरंक्षण दिये जाने की जरूरत का भी उल्लेख किया ।
सुश्री गिन्जा चांग, भारत में यूनेस्को की निदेशक, ने कहा 'वर्ल्ड हेरिटेज कन्वेंशन, 1972` (विश्व विरासत संधि) पर हस्ताक्षरकर्ता के नाते, भारत के कतिपय दायित्व हैं, जिनका उसे व्यापक दायरे में निर्वहन करना चाहिये, यथा :
1. सरकार से न केवल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संरक्षित स्मारकों की अपितु भूदृश्यों व अमूर्त विरासतों की राष्ट्रीय सूची बनाने की आशा की जाती है ।
2. विश्वविरासत स्थलों के लिये एक राष्ट्रीय समिति आवश्यक है क्योंकि वे सब के सब भारतीय पुरातत्व सर्वे के निर्देशन में नहीं हो सकते ।
3. हमारे कानून में खामियां : नगर विकास योजनाएं (मास्टर प्लॉन) भू-उपयोग की योजनाएं होती हैं, जिनमें विशेष क्षेत्रों के संरक्षण का नाममात्र उल्लेख होता है । यह उल्लेख तब तक काफी नहीं माना जाता, जब तक जोनल योजनाओं में विरासत क्षेत्रों को शामिल न किया गया हो तथा 100 मी0 व 200 मी0 के बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के विनियमों को शामिल करने के विस्तृत उपनियम नहीं बनाए गये हों ।
श्री ई.एफ.एन. रिबैरो ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ज़ोनल विकास योजनाएं फरवरी 2008 तक पूरी कर ली जाएं तथा ए.एस. आई. द्वारा 1:2000 के पैमाने पर स्पष्ट नक्शे दिये जायें, जिनमें संरक्षित इमारतों तथा नियमित और विनियमित क्षेत्र (सीमित ऊचांई की मान्यता सहित) दर्शाये जाएं । श्री कुलदीप सिंह ने कहा कि निजामुदीन जैसे वास्तुकीय विरासत संपदा से भरपूर इलाकों के नक्शे बनाना बहुत कठिन है क्योंकि विनियमित क्षेत्रों के कई सर्किलों में दोहरा क्षेत्र-अधिकार है । श्री ए.जी.के. मेनन ने दो सघन क्षेत्रों के लिए ज्यामितीय माप की अनिवार्यता की बजाय उदार रुख अपनाने का सुझाव दिया । श्री चार्ल्स कोरिया ने रोम का उदाहरण देते हुए कहा कि निषेधों को सुरक्षित कार्रवाई के रूप में देखा जाए जिसके अंतर्गत ए.एस.आई. के लिए बाउडंरी को संशोधित करना सम्भव हो । इस पर सुश्री यांग ने कहा कि रोम में तो जब विवाद होता है, तो सिटी मास्टर प्लान पर कन्जरवेशन प्लॉन को वरीयता दी जाती है लेकिन भारत के मामलों में ऐसा नहीं है श्री मदन ने अफसोस जाहिर किया कि भारत ने विरासत को गर्व का विषय न मान करके बोझपूर्ण जिम्मेदारी माना जाता है ।
सुश्री गुरमीत राय ने लाल किले की सरंक्षण योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी फर्म और ए.एस.आई. की यह संयुक्त कार्रवाई है साथ ही उन्होंने एक विसंगति के बारे में बतलाया कि यह योजना जहाँ यूनेस्को मानकों के अनुसार है, वहीं ए.एस.आई. मानकों के अनुरूप नहीं है । उन्होनें बताया की दिल्ली नगर निगम की कुछ परियोजनाएं लाल किले के पर्दाबाग पार्किंग हितों के विपरीत हैं । जिससे सुनहरी मस्जिद का खूबसूरत नज़ारा अवरूद्ध हो जाता है । चूंकि संरक्षण योजना को मान्य ठहराया गया है अत: ए.एस.आई. के लिए आवश्यक है कि इस योजना के कार्यान्वित करे ।
श्री रतीश नन्दा ने यू.एस.ए. की राजधानी वाशिगंटन डी.सी. की तुलना भारतीय शहरों से करते हुए कुछ आकड़े देते हुए बताया कि अमरीकी राजधानी में ए.एस.आई. के भारत भर में संरक्षित स्मारकों की कुल संख्या से अधिक विरासत इमारतें हैं । दिल्ली के लिए अपनी 1200 सूचीबद्ध इमारतों, जिनमें ए.एस.आई. की 174 मान्य इमारतें भी शामिल हैं, को मान्यता देकर उनकी सुरक्षा करना असम्भव नहीं है । उन्होनें यह भी आग्रह किया कि दिल्ली सरकार के पुरातत्व विभाग को संरक्षण की अधिक शक्तियां देकर और उपयोगी बनाया जाए ।
श्री कोरिया का कहना था कि दिल्ली के कुछ खास क्षेत्रों के अपने कायदे कानून हैं । जब किसी विरासत क्षेत्र / ढंाचे के निकट कोई निर्माण किया जाए तो वहां पुराने की बजाए नये प्रकार के हल्के बदलाव के साथ सुरूचिकारी उपाय अपनाये जा सकते हैं । चूंकि ए.एस.आई. केवल पुर्व निर्मितियों / ढंाचों का संरक्षण करता है अत: स्थानीय निकाय को चाहिये कि उन ढांचों के चतुर्दिक क्षेत्र का संरक्षण-विनियमन वह स्वयं करे । सुश्री यांग का सुझाव था कि स्थानीय एजेंसियों को संरक्षण व हेरिटेज़ हाउसेज यानी स्थानीय कार्यालय की स्थापना में सलाह देने के लिये आर्किटेक्ट प्लानर (वास्तुकार-नगरनियोजकों) की नियुक्ति की जाए । इन हेरिटेज़ कार्यालयों द्वारा स्थानीय समुदाय के पढ़ने-समझने के लिये प्रलेख फोटो व नक्शे आदि उपलब्ध किये जाएं । श्री नवीन पिपलानी, टी.वी.बी. स्कूल ने तुर्कमान गेट एरिया पर प्रस्तुतीकरण किया, जिसमें बताया गया कि इससे इस विशालकाय ढांचे के पास-पड़ोस के हिस्से ए.एस.आई. के नियमों-विनियमनों से प्रभावित हो सकते हैं । अत: उनका सुझाव था कि वहां सम्पर्क मार्गों, वीथियों व खुले परिसरों की व्यवस्था करके तथा दृष्टक्षेत्र को महत्व देकर अधिक सुखद व जैविकीय भूपरिदृष्य का सृजन किया जा सकता है । इस स्कूल के श्री अशोक लाल ने खिड़की गांव का खाका पेश करते हुए बताया कि इस एतिहासिक - विरासती गांव की बाह्य दिखावट और वहां के वाशिन्दों की आर्थिक और सामाजिक हैसियत स्वत: ही आगे बढ जाएगी, अगर वहां पर ए.एस.आई के विनियमनों और दिल्ली नगर निगम के उपनियमों को अधिक कड़ाई से न लागू किया जाए । श्री कुलदीप सिंह ने जोर देकर कहा कि सभी संरिक्षत ढांचों के आस पास के सभी क्षेत्रों में डी.डी.ए., एम.सी.डी., ए.एस.आई, राज्य पुरातत्व विभाग तथा दिल्ली नगर कला आयोग की भागीदारी में रूपांकन / आकृति सृजन की कार्रवाई पर तेजी से अमल किया जाए । श्री सुधीर वोहरा का कहना था कि स्थानीय निकायों के पास उपलब्ध कई नक्शों में विरासत स्थल चिन्हित नहीं किये गये हैं तथा यही स्थिति विरासत स्थलों की है, अत: लोकल एरिया नक्शों में भी सुधार कर दिया जाए । डा. प्रियालीन सिंह ने दिल्ली में अनेक एतिहासिक बागों की दुर्दशा का बखान करते हुए बताया कि उनकी बाउंड्री की उपेक्षा के साथ-साथ भारी अतिक्रमण भी हो रहा है । श्री यांग ने कहा कि लगता है कि भारत में संरक्षित भूसंयोजनों के बारे में कोई कानून नहीं है ।
प्रो0 सुनील कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय का तर्क था कि दिल्ली के इतिहास को उसके एतिहासिक पड़ोस के संदर्भ में ही अच्छी तरह समझा जा सकता है । विरासती भवनों और पड़ोसी समुदायों के बीच तालमेल के बारे में श्री जॉनहर्ड की टिप्पणी पर श्री कुमार ने कहा तब तो सन् 1947 के बारे में मौन को भंग करना जरूरी होगा । आज के शहरी कृत गांवों के निवासी देश-विभाजन से पीड़ित शरणार्थी हैं, जिनका उनके बीच स्थित मध्यकालीन स्मारकों के साथ कोई वंशानुगत या एतिहासिक संबंध नहीं है । उन्हें इस एतिहासिक - असंगतता के बारे में बताया जाए तथा उनके आस-पास मौजूद एतिहासिक ढांचों के प्रति लगाव की भावना विकसित की जाए । श्री ए.जी.के.मेनन ने इसका समर्थन किया और कहा कि इतिहास और परिस्थितिजन्य परिवेश (इकॉलोज़ी) में बढ़ती हुई रूचि यह सुनिश्चत करने में दरशाई जाए कि एतिहासिक विरासत क्षेत्रों के बारे में बहु-आयामी दृष्टि कोण अपनाया जा रहा है । ए.एस.आई. के कार्मिकों की तैनाती दिल्ली नगर निगम में की जाए, ताकि उनके सरोकारों में किसी प्रकार का टकराव उजागर न हो । ए.एस.आई. की तरफ से श्री मदान ने कहा कि वास्तुकीय विरासत को एक बंटी हुई जिम्मेदारी की बजाए 'साझा दायित्व` के रूप में देखा जाए । दिल्ली के 1500 किलोमीटर क्षेत्रफल में से केवल 5% यानी 75 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर ही विरासती स्थल हैं । सर्वे एजेंसी के रूप में समझी जाने वाली भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्था, जो कभी स्मारकों के संरक्षणकार के रूप में जानी जाती थी, अब 1992 की अधिसूचना के बाद औसत दिल्ली वासियों के बीच काफी लोकप्रिय है । ए.एस.आई. अपने बजट की केवल 2% राशि ही विरासत देखभाल पर खर्च करती है । अब समय आ गया है कि अधिसूचना को दिल्ली के मास्टर प्लान में शामिल किये जाने वाले विरासत भवनों और स्थलों के बारे में लोकल एरिया प्लानिंग व प्रबंध में शामिल योजनाओं में मान्यता दी जाए ।
श्री शहीर का आग्रह था कि ए.एस.आई. को अपवर्जनकर्ता की बजाय महान कार्यकर्ता के रूप में देखा जाए तथा स्थानीय लोगों को अपने इलाके के दीर्धकालीन इतिहास से जोड़ा जाए । श्री जसबीर साहनी ने विकास के साथ सही-सही संरक्षण के सवाल पर बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत पर जोर दिया । श्री कोरिया ने 100 मी0 व 200 मी0 जोनों के सुधड़ समन्वय (फाइनटयूनिंग) पर तथा ए.एस.आई. के साथ मिलकर कार्य करने पर जोर दिया ।
श्री शहीर के सुुझाव पर आयोग ने प्रयोग के तौर पर 6 परियोजनाओं यथा लाल किला, पुराना किला, रोशनआरा बाग, उतरी रिज़, मेहरोली, निजामुदीन तथा खिडकी गांव परियोजनाओं को हाथ में लेने का प्रस्ताव किया । दूसरा सुझाव था कि ए.एस.आई. द्वारा दिल्ली में उपलब्ध विभिन्न भाषाओं में वर्णित इमारतें व संरक्षित स्थलों की सूची बनाकर उसकी प्रतियां सभी को सुलभ की जाएं तथा दिल्ली के एतिहासिक बागों जल-वावड़ियों व जलधाराओं (नदी-नहर-नालों) की भी सूची बनायी जाए ।

दिल्ली की वास्तु विरासत पर 4.8.2007 की डी.यू.ए.सी. वर्कशाप में भाग लेने वाले महानुभावों की सूची :-
क्रम सं0
नाम सर्वश्री
पदनाम / संस्था
1
श्री ए.के. सिन्हा
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
2
प्रो0 अशोक लाल
टी.वी.बी. स्कूल ऑफ हेबीटेट स्टडीज़
3
श्री अशोक श्रीवास्तव
टी.वी.बी. स्कूल ऑफ हेबीटेट स्टडीज़
4
प्रो0 ए.जी. के मेनन
सलाहकार
5
श्री चार्ल्स कोरिया
अध्यक्ष, दिल्ली नगर कला आयोग
6
श्री चन्द्र शेखर
निदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
7
श्री ई.एफ.एन. रिबेरो
--
8
सुश्री गुरमीत एस.राय
सी.आर.सी.आई.
9
श्री जॉन हर्ड
आई.सी.ओ. एम.ओ.एस.
10
श्री जसबीर साहनी
सदस्य, दिल्ली नगर कला आयोग
11
श्री जे0 के0 मिट्टू
परामर्शदाता
12
श्री जे.वी.एस. चौहान
परामर्शदाता, राष्ट्रीय नगर कार्य संस्थान
13
श्री कुलदीप सिंह
परामर्शदाता
14
सुश्री ंमिंजा यांग
डाइरेक्टर, यूनेस्को, नई दिल्ली
15
प्रो0 एम0 शहीर
सदस्य, दिल्ली नगर कला आयोग
16
श्री मानसिंह राणा
वास्तुविद
17
श्री नवीन पिपलानी
संरक्षण वास्तुविद
18
डा0 नारायणी गुप्ता
सदस्य, दिल्ली नगर कला आयोग
19
श्री ओ0पी0 जैन
संयोजक, (दिल्ली अध्याय) इनटैक
20
सुश्री प्रियालीन सिंह
प्रो0 एस0पी0ए0
21
श्री प्रशांत बैनर्जी
टी0वी0बी0, एस0एच0एस0
22
श्री रतीश नन्दा
सरंक्षण वास्तुविद
23
श्री रवि कायमा
परामर्शदाता
24
श्री एस0सी0 गुप्ता
--
25
डा0 सुनील कुमार
इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
26
श्री संजीब सेनगुप्ता
नई दिल्ली नगरपालिका परिषद
27
श्री सुधीर वोहरा
वास्तुविद्
28
श्री सुवीर माथुर
वास्तुविद्
29
श्री टी0 जे0 अलोन
ए0एस0आई0, (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण)
30
सुश्री तन्नवी वर्मा
टी0वी0बी0, एस0एच0एस0
31
श्री विजय एस0 मदान
अपर महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
32
श्री वसंत कुमार शारनीकर
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
33
श्री विकास मालू
वास्तु अभियन्ता
34
श्री विवेक कुमार
वास्तुविद्

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